दे दुश्मन को दे दे धुनकर
है है हम में है है ये हुनर
अब बिगुल बजा मस्तक पे सजा
तलवारों से ले ले हुंकार
इतिहास ने डरना सीखा नहीं
और भविष्य डरा सकता नहीं
दुश्मन का सीना छलनी कर
के वर्तमान की है ये पुकार
कल कल करती नदियों से बहा
वो खून जो दुश्मन का मद है
दे दे आहुति दुश्मन की
धरती माँ का है ये उधार
उन पेड़ों की शाखायों को
जिनके पत्ते उसने तोड़ दिए
उन हाथों की हिम्मत फिर न हो
यूँ दुश्मन का तू कर संहार
निश्छल माँ की छाती पर
जिसने अगणित वार किए
उस दुस्साहस का चीर कर
दुगनी शक्ति से कर प्रहार
चुप्पी को कमज़ोरी समझ
जिसने मेरा अपमान किया
उस मन मातिष्क के धारी का
ध्वस्त हो यूँ कर उपचार
दे दुश्मन को दे दे धुनकर
है हम में है है ये हुनर