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Wednesday, 15 February 2017

क्या से क्या हो गए

ढूंढते हैं उसको जिसे कहीं छोड़ आए हैं
वो मुस्कराहट, वो बेबाकपन जो कहीं भूल आए हैं
कई चेहरों का नक़ाब ओढ़े असल से जुदा हो गए
ज़िन्दगी आगे बढ़ गयी हम क्या से क्या हो गए

माथे से लेकर बिस्तर की सिलवटें जो मेरी थीं
वो चैन, वो ठहाके, वो नींदें जो मेरी थीं
कई ख्वाइशों के बोझ के तले रुबा हो गए
ज़िन्दगी आगे बढ़ गयी हम क्या से क्या हो गए

ख्यालों से लेकर हौसलों की तिशनगी थी मेरी
उन्हें पूरा करने न करने की आज़ादी थी मेरी
कई हौसलों के ज़ोर में बेनिशाँ हो गए
ज़िन्दगी आगे बढ़ गयी हम क्या से क्या हो गए

यूँ नहीं के ज़िन्दगी से कोई शिकवा है हमें
इस डोर, इस बंदिश का भी दरकार है हमें
कई आहटों के शोर में बेज़ुबान हो गए
ज़िन्दगी आगे बढ़ गयी हम क्या से क्या हो गए

Tuesday, 6 December 2016

एक हसींन खयाल

मिले फ़क़त इतना वक़्त तेरे ख़याल हो जाए
जहां का सुकून भी हसरत ए बेज़ार हो जाए
कभी जो तनहा पा सकूं खुदको तेरे एहसास से
उस लम्हा चाँद भी बेदाग़ हो जाए

यूँ गुज़र के लम्हे में उम्र गुज़रती है
नज़रों पे करम तेरा रुखसार हो जाए
एक हसींन मुलाकात मेरे नसीबवर हो
ज़िन्दगी रंगीन बेशुमार हो जाए

तेरे तस्सवुर से ही जो रूह में लौ सी जलती है
उस रौशनी का खुदा भी तलबगार हो जाए
एक ज़िन्दगी नहीं काफी तुझे यूँ चाहने को
एक ख्याल पे एक ज़िंदगी निसार हो जाए