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Wednesday, 7 September 2016

My Second Poem - THE OCEAN

********THE OCEAN****************************

The waves are mighty and rise so high
Palpable is the feeling, the end is so nigh
Mightiest of the mighty mortals, can never dare, to conquer
Almighty, the only one, who can tame the tides to stay calmer

The ocean is so calm, it barely looks to frighten
Yet, it is so menacing, when unleashes ruthless pandemonium
Calm Ocean is utopia of such fun and blitheness
Contrarian Ocean, is yet, full of subjugation and monstrous wilderness

Such specter of duality, barely seen elsewhere
Only a human self, assimilate the duality, in his inner
The tranquility of a sage, restlessness of a calf, on the same podium
The agitation and tranquility rarely seen as closest companion

When I am agitated, I go to ocean, in the night
Then the waves appear to dance, in the high tide
My nerves, become calmer, witnessing the, unfolding macabre
The pandemonium in me, succumbs to the ultimate mighty ruler

From the time, I began making sense and comprehend
Always found the ocean, out of dejection, to be my friend
Times I flirt the waves to challenge the supremacy

Though I am reminded of the eventual authority.

Lal Swain

Tuesday, 6 September 2016

प्यार का इज़हार

प्यार का इज़हार
लड़की की शादी से पहले :
चेहरा है तेरा झील जैसा, आँखे तेरी कमल है,
बिन बोले ही सब कुछ बोल देतीं हैं, बड़ी भोली तेरी शकल है,
अंदाज है तेरा कातिलाना, मार डालेगा मुझे इक दिन,
यह इजहारे मुहब्बत है, कोई गीत है कोई गजल है,
लड़की की शादी के बाद :
तेरी मुसकुराहट ने दीवाना बना रक्खा है मुझको,
जी चाहता है जी भर के तुझे प्यार करू,
जब जाती है नज़र माथे में लगे टीके पर,
तो सोचता हूँ कि इज़हार करूं या करूं.

ग़ाज़ियाबाद रेल्वे स्टेशन - बदलाव ज़रूरी है।

ग़ाज़ियाबाद रेल्वे स्टेशन - बदलाव ज़रूरी है।
आज के समय में जबकि हम स्मार्ट सिटी की बात कर रहे है, नोर्मल स्पीड ट्रेन से हाई स्पीड एवं बुलेट ट्रेन की बात कर रहे है। ट्रेन के भीतर एवं बाहर में दी जानी वाली सुविधाओं में तब्दीली की बात कर रहे है। आज जबकि देश के कई एयरपोर्ट एवं बस अड्डों की शक्लें पूरी तरह से बदली जा चुकी है। वहीँ दिल्ली एनसीआर के ग़ाज़ियाबाद रेल्वे स्टेशन जहाँ से ग़ाज़ियाबाद, इंदिरपुरम, राजनगर इक्स्टेन्शन, क्रॉसिंग रिपब्लिक, नॉएडा, एवं ग्रेटर नॉएडा में रह रहे निवासी नियमित रूप से यात्रा करते है की हालत बहुत ही ख़राब है।

इंदिरपुरम, क्रॉसिंग रिपब्लिक, नॉएडा एवं ग्रेटर नॉएडा में रह रहे निवासी यहाँ से यात्रा करने के लिए विजयनगर की तरफ़ से इस स्टेशन का रूख करते है।

और समस्याओं का जंजाल सुरु हो जाता है स्टेशन के एंट्री पॉइंट पर ही। यहाँ पर कार पार्किंग के ठेकेदार ने रस्सी लगाकर स्टेशन तक जाने वाले रास्ते को बन्द किया हुआ है और अगर आपको किसी को केवल ड्रॉप भी करना है तो आपसे ज़बरन पार्किंग शुल्क वसूला जाता है।

इसके बाद इस तरफ़ के एंट्री पॉइंट पर कोई भी  डिस्प्ले बोर्ड की सुविधा नहीं है। आपको ट्रेन की वस्तुस्थिति जानने के लिए फूट-ओवर-ब्रिज को पार कर स्टेशन के दूसरी तरफ़ बनी स्टेशन बिल्डिंग तक पैदल जाना होगा। इस ब्रिज का लेवल भी समतल नहीं है।  स्टेशन बिल्डिंग पर भी अभी तक इलेक्ट्रॉनिक डिस्प्ले बोर्ड की कोई सुविधा नहीं है आपको इन्क्वारी काउंटर में रखे बोर्ड में लिखी सूचना को पड़ने के लिए लाइन में लगना पड़ेगा एवं फिर  स्टेशन में  प्रवेश करने के लिए दोबारा से स्कैनिंग प्रक्रिया से गुज़रना पड़ेगा।

बुज़ुर्ग, शारीरिक रूप से कमज़ोर, विकलांग, एवं ज़्यादा समान लेकर चल रहे अकेले यात्रियों के लिए इस स्टेशन से ट्रेन पकड़ना एक अलिम्पिक में मेडल जितने के चैलेंज जैसा है। उनके लिए एलेवेटर तक की सुविधा नहीं है।  आज हम नोकिया से स्मार्ट फ़ोन की तरफ़ बड़ गए लेकिन ग़ाज़ियाबाद रेल्वे स्टेशन हम नहीं बदलेंगे वाले अन्दाज़ के साथ दिन प्रतिदिन यात्रियों की बड़ती हुई संख्या को अपनी सेवाएँ दे रहा है।

प्लैट्फ़ॉर्म की हालत भी बहुत जर्जर है। मैं इंदिरपुरम में वर्ष 2002 से रह रहा हूँ और मैंने इन प्लैट्फ़ॉर्म की हालत सुधारने को लेकर सरकार का कोई भी क़दम हक़ीक़त में नहीं देखा। आज जबकि हमारा रेलवे मंत्रालय स्टेशन पर खाने पीने की वस्तुओं की क्वालिटी की बात मात्र करता है वहीं ग़ाज़ियाबाद रेलवे स्टेशन पर आपको इन सब दाँवों की धज्जियाँ उड़ती नज़र आएँगी।

कब होगा बदलाव और क्यों नहीं हुआ बदलाव अभी तक। इन सभी प्रश्नो के साथ मैं आज ट्रेन का सफ़र कर रहा हूँ जोकि मैंने इस वर्षों पुराने बने स्टेशन से शुरू किया है और साथ ही इस बात की भी चिंता है की कल जब मैं वापिस आऊँगा तब फिर मुझे इन सभी मुसीबतों के साथ अपना सफ़र ख़त्म करना होगा।

मेरे बचपन का शहर

मेरे बचपन का शहर
मुझे देख खिल उठी और लिपट गयी मुझसे,
वो कोई और नहीं उस पेड़ की डाल थी जिसे बचपन में सींचा था मैंने,
इस जगह की मिट्टी की महक कुछ अलग ही है,
यहीं पड़ना और लिखना सीखा था मैंने,
आज आख़िर उस शहर आ ही गया मैं,
जिसे कुछ पाने की हस्र में पीछे छोड़ा था मैंने,
अब तो यादें भी बूढ़ी हो चली हैं,
उनके चेहरे की झुर्रियों से यह जाना मैंने,
जिन पेड़ो की साख में कभी रखते थे कंचे
आज उन्ही साखों पर सांपो का डेरा देखा मैंने,
एक समय था जब दूर घाटी से सुनाई देती थी बांसुरी की धुन
उन्ही घाटियों से आज गाड़ियों का शोर सुना मैंने,
अनगिनत तारों से घिरा था मेरे बचपन का आसमान,
उसी आसमाँ में आज तारों को गिना मैंने,
वो भी एक सूरज था जो करता था मेरा इंतज़ार,
आज उसी सूरज को अपनी आँखों से ओझंल होते देखा मैंने,
सांझ होते होते खा लेते थे खाना कहीं भी,
आज उसी शहर में खरीद कर पानी पिया था मैंने,
जहाँ गिरते ही थाम लेते थे हज़ारों दामन,
वहीँ आज बहुत अकेला महसूश किया मैंने,
यह मेरे बचपन की यादें थीं,
जिन्हें जवानी भर जिया था मैंने,
यह शहर आज भी मुझे उतना प्यारा हैं,
जहाँ पर सच में अपना जीवन जिया था मैंने।
जहाँ पर सच में अपना जीवन जिया था मैंने।

Monday, 5 September 2016

मेरी यादों का गांव

एक गांव जो बसता है कहीं यादों मे मेरी
जहाँ अटखेलियां करती थीं गर्मी की छुटियाँ कई

पहाड़ों की ओट में वो खुशबूदार आम के बगीचे
वो घंटाघर टेहरी का वो शाम को भूतों के किस्से

खुला मैदान जो मिलता पथरीली सी पगडण्डी पे
और जा समाता था निडर बहती भागीरथी में

याद आता है गर्मी की बारिश में वो भीग जाना
नमक और प्याज़ चुरा कर कच्चे आम संग खाना

यूँ अचानक कभी आ जाता है याद ननिहाल पहाड़ों का
कहते हैं अब शीशे से पानी की तह से घंटाघर है तकता

है ढूंढता वो खोये चेहरे, नन्हे चेहरे
जो आते थे गर्मी की छुट्टियाँ बिताने को

शायद मिल जाएँ आज भी अठखेलियां करते
सरकारी बस से गुज़र पाऊँ, कभी जाऊँ तो

Thursday, 7 July 2016

समय

समय है सबसे बड़ा बलवान
यह है सब पर मेहरबान
जीत न पाया इससे कोई भी इंसान ।

समय पर ही होते सारे काज
चाहे जितना मर्जी जोर लगा लो आज ।
है यदि समय तुम्हारे अनुकूल
तो ही कर पाओगे सारे काम तुम अपने अनुकूल ।

चाहे जितना मचालो शोर
पर नही जीत पाओगे यदि समय है तुम्हारे प्रतिकूल ।
शब्दो मे होती है ताकत बड़ी पर,
कर्मठ ही होते बलवान ।
जिस कर्म के पीछे मंशा न हो बुरी
उसका साथ देते भगवान् ।

माखन चोर थे नंद किशोर
दी थी भगवान् को भी उपाधि चोर की ।
लेकिन झुक जाते सर सभी के माखन चोर के सामने
जब समय दिखाता है अपना जोर ।

रहो हमेशा कृतज्ञ बन कर
न निकले मन से कभी अपशब्द
 न हो तुमसे भूले से भी कोई भूल ।
क्योंकि समय आने पर समय फल देगा
तुम्हारे कर्मो  के अनुकूल ।

रहे विश्वास अपने पर बस
यही सिखाता समय  हमे।
धैर्य रहे बुरे समय मे और
सुख मे भी  न भूले समय का रूप ।

लीना निर्वान

रास आती है बस खुशिया ।

शब्दो की चाशनी मे घोल कर
कहलो मन की बात
रह जाएगा द्वेष भाव यही पर
बस स्वभाव जाएगा साथ ।

सब जीत जाएँ ज॔ग यह संभव नही
पर जीत लो आज मन सबका
यह असंभव भी नही ।

टपका दो बूँद अपने अमृत की
जो मिली है सब को वरदान ।

क्यो करते हो इतना संताप
और हो जाते हो खुद ही हताश
चलो सब ले आए खुशिया
और बाँटे खुले दिल से जग मे आज।

लीना निर्वान