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Friday, 8 December 2017

ओ माँ


कई बार लिखना चाहा

पर लिख ना सका। 

तेरी यादों और बातों को

शब्दों में कस ना सका। 

 

लगता है बड़ा हो गया हूँ 

बचपन अपना भूल गया। 

इतना सबकुछ लिख डाला पर 

तुझपर लिखना भूल गया। 

 

रोज़ ख़यालों में आतीं हों 

कस कर गले लगा लो ना। 

तेरा ही तो बच्चा हूँ माँ

लोरी आज सुना दो ना। 

 

जिस उँगली को पकड़कर सीखा

इस जग का इक इक पाठ। 

पढ़ा रहा हूँ सबको वोहि

दो दूनि चार और चार दूनि आठ। 

 

तेरी कही हुई इक इक बात 

आज भी याद आती है। 

फिर भी ग़लती कर देता हूँ

और वो सबक़ बन जाती है। 

 

अपने पोते और पोती को भी

कुछ ऐसा पाठ पढ़ा दो ना।

तेरा ही तो बच्चा हूँ माँ

लोरी आज सुना दो ना।

इक पहाड़ी में मेरा घर


मैं वो ही हूँ

जो सड़क के नीचे वाले

सरकारी स्कूल में पढ़ता था। 

सीमित ही सही

पर साफ़ सुथरे 

कपड़े धारण करता था। 

 

मेरा घर 

उसी सड़क के नीचे पड़ता था। 

शायद मेरे शहर में 

हरेक का स्तर 

सड़क के ऊपर 

या नीचे होना ही तय करता था। 

 

हवा तुम्हारे घर को

और मेरे घर को

बराबर ही मिलती थी। 

पर हाँ सूरज की किरणें

तुम्हारे घर पर 

कुछ ज़्यादा ही गिरती थीं। 

 

सब समय का फेर है 

वो सड़क

आज भी वैसी ही है। 

मेरा घर

आज भी 

उसी सड़क के नीचे ही है।

 

लेकिन आज ...

सब कुछ बदल सा गया है। 

सूरज की किरणें ...

मेरे साथ साथ चलती है। 

हवायें ...

मेरे साथ रूख बदलतीं हैं। 

 

 

अगले जनम में

किसी के साथ

तुम इतना ज़ुल्म ना करना। 

इक सड़क से

किसी की हैशियत

तय ना करना।

 

मैं आज

ना जाने कितनी लम्बी सड़कें बनाता हूँ

नए नए शहरों को

बसाता हूँ।

कुछ घर सड़क के ऊपर और कुछ नीचे

आज भी बनते है। 

वैसी ही पहाड़ी पर

जहाँ कभी एक घर मेरा भी था। 

मौसम बड़ा सुहाना है


आज उसके घर की खिड़की जो खुली

बादलों ने हटा दिया घूँघट

मेरे शहर में आज धूप निकली है

मौसम भी कुछ खिला - खिला सा है

 

ठंडी हवा की लहर उसकी खिड़की से गुजरी होगी

उसके गालों को छूकर निकली होगी

इस सर्द मौसम में

तभी तो फ़िज़ा का रंग गुलाबी सा है

 

हर एक कली खिली - खिली सी है

मौसम बड़ा सुहाना है

ये उसके बदन की खुशबू का असर है

तभी तो फूलों की खुशबू खुशनुमा सी है

 

शाम को चाँद भी उसकी खिड़की में झांकेगा

उसके दीदार की इक झलक पाने के लिए

उस मंजर को देखने की ललक में

रात होने की बड़ी बेबसी सी है 

हार जीत


कभी कभी ....

जीतने के लिए हारना ज़रूरी है। 

परन्तु .....

हर हार से एवं हर जीत से।

एक सबक़ सीखना ज़रूरी है। 

 

जीवन में बहुत मौक़े आएँगे। 

जीतने के ....

असली जीत उस दिन होगी। 

जब हम ख़ुद से जीत जाएँगे।

लेकिन ....

उसके लिए ज़िंदगी जीना ज़रूरी है। 

 

क्यूँ आए थे हम यहाँ जन्म लेकर। 

क्या मक़सद है इस ज़िंदगी का।

क्यूँ हम लड़ते है। 

कभी ख़ुद से, कभी अपनों से। 

इन सवालों के जवाब पाना भी ज़रूरी है। 

 

आओ मिलकर इक ज़िंदगी जी ले। 

साथ साथ ....

आओ इक दीपक जला ले।

साथ साथ ....

आओ इक बार गले मिल ले। 

फिर से ....

सोचो .... 

क्या इसके लिए दिवाली या ईद ज़रूरी है। 

 

दिलों में यह जो दूरियाँ है। 

इन्हें कम करना होगा। 

जब साथ में ही रहना है। 

तो ....

कुछ क़दम साथ चलना होगा। 

बहुत जी लिए अपने लिए। 

लेकिन ....

अब ....

दूसरों के लिए जीना भी ज़रूरी है। 


पास पास बैठो कभी। 

यूँ दूर से क्यूँ बात करते हो। 

कुछ तुम अपने दिल की कहो। 

कुछ तुम उसके दिल की सुनो। 

जानता हूँ .....

कुछ बातों के मतलब नहीं होते। 

लेकिन कभी कभी साथ में। 

एक चाय पीना ज़रूरी है।

यादें


वो तेरा नज़रें झुकाकर मेरे सामने आना। 

पैरों की अंगुलियों को आपस में दबाना। 

कुछ ना भुला हूँ मैं। 

हर एक मंज़र आज भी याद है मुझे। 

 

सब पूछते है कौन हो तुम। 

जो आज भी याद बनकर साथ है मेरे। 

तुम हक़ीक़त हो या एक अहसास मेरा। 

कैसे कह दूँ मैं नाम तेरा। 

भुला नहीं हूँ याद है मुझे। 

 

तुम यूँही मेरे गीतों में आते रहना। 

तुम ही तो मेरे गीतों की धड़कन हो। 

मेरे हर शब्द में रहता है वजूद तेरा। 

तेरे बिन ये भी अधूरे है। 

भूलना नहीं है मुझको तुझको। 
तुम्हें हो ना हो पर याद है मुझे। 

Friday, 17 November 2017

बचपन

गर बचपन सा होता बचपन
मीठा बचपन अल्हड़ बचपन
गलियों में कहीं पतंग उड़ाता
करता अक्कड़ बक्कड़ बचपन

सुबह जो होती बड़ी कड़क की
बस्ते से भी भारी बचपन
छुट्टी की घंटी बजते ही
मूगफली की छाल सा बचपन

गर पहले सा होता बचपन
धूल मिट्टी से सना सा बचपन
छुप के बागों के पेड़ों चढ़
कच्ची अमिया खाता बचपन

मेरे बचपन की शामों में
निडर हो मदमस्त घूमता
खुले आसमां के तारे गिन
चंदा मामा गाता बचपन

गर नीला रह जाता बचपन
हरे भरे खेतों का बचपन
नदियों और तालाबों के संग
डुबकी खूब लगाता बचपन

दोस्त की साईकल दोस्त की पेंसिल
दोस्त का खाने का डब्बा अच्छा था
फिर हाथों को सान सान कर
पेन की स्याही चुराता बचपन

गर सीधा सा होता बचपन
फिर बैटिंग को लड़ता बचपन
दोस्त पर पड़ती टीचर की बेंत पर
अपना हाथ बढ़ाता बचपन

काश पहले सा होता बचपन
आज के बचपन के मुकाबले
कंप्यूटर और मोबाइल से बाहर
खूब शोर मचाता बचपन
--लिपिका